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कश्मीर ~ KASHMIR

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The Horizon

भटकती हैं मेरी यादें
उन पर्वतों के गलियारों में
कुदरत का खूबसूरत नमूना
पेश-ए-खिदमत
जिसकी रक्षा की है
देश के जवानों ने ।

कोई इज़्ज़त लूट रहा है इन वादियों की
कोई इज़्ज़त बचा रहा है अपने साथियों की
क्या समझ घास चरने गयी है
सब देश के चालक, समझदारों की ?
मख़मली बर्फ़, आग़ोश में भर पर्वतों को
मरहम लगाती उन जमे हुए अश्कों से
जिसे इंसानों ने पाट, पगडंडी बनाई
मार साथियों को हथियारों से ।

है वो जन्नत पर
उस जन्नत से उसका कोई वास्ता नहीं
यहां बैठे हैं कई राक्षस,
जिनका देवताओं जैसा कोई मुखौटा नहीं
जिंदादिली और ताकत का मिश्रण
जिया है मैंने इन आंखों से
साज-सज्जा में कोई कमी नहीं की
ईश्वर ने संजोया-तराशा है अपने हाथों से ।

ये मूर्ख इतना भी नहीं समझते
इसको बाँट-बाँट, खुद को बाँट रहे हैं
और सारा दोष असीम शाँत घाटियों पर
मढ़ने से बाज नहीं आते…

View original post 71 more words

Author: DEBASIS NAYAK

A natural leader who experiments a lot and cares for all ! The title of my blog is not about my blood group. It's a message to all my readers to think positive and write on my blog posts openheartedly what they think!!

2 thoughts on “कश्मीर ~ KASHMIR

  1. कश्मीर की दर्दे दास्तां बिल्कुल सही ब्यां की है

    Liked by 1 person

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