THE PATH TO A STEADY MIND

GITA WISDOM # 71Chapter 2 Verse 65 प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते।प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते॥ श्लोक 65 – अध्याय 2 – गीता का सार     अन्तःकरण की प्रसन्नता होने पर इसके सम्पूर्ण दुःखों का अभाव हो जाता है और उस प्रसन्नचित्त वाले कर्मयोगी की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से हटकर एक परमात्मा में ही भलीभाँतिContinue reading “THE PATH TO A STEADY MIND”

TOWARDS A FUTURE STEEPED IN CONSCIOUSNESS

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In the preceding post, we brought in focus the fact that the first step in the process of evolution is the act of creation of information, followed by the emergence of energy and matter. Their interaction creates the Cosmic Mind and the Cosmic Consciousness, which also comprises such other subsets as…

WHEN LAZINESS SURFACES

GITA WISDOM # 68Chapter 14 Verse 13 अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च।तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन॥ हे अर्जुन! तमोगुण के बढ़ने पर अन्तःकरण और इंन्द्रियों में अप्रकाश, कर्तव्य-कर्मों में अप्रवृत्ति और प्रमाद अर्थात व्यर्थ चेष्टा और निद्रादि अन्तःकरण की मोहिनी वृत्तियाँ – ये सब ही उत्पन्न होते हैं ॥13॥ Human beings suffer from various melodies whenContinue reading “WHEN LAZINESS SURFACES”