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परछाई बूंदों की होती

The Horizon

परछाई बूंदों की होती, सागर की नहीं
अंधेर दीपक तले होता, सूर्य के नहीं
नज़र है पास सबके, क्यों नज़रिया नहीं ?
ज़िन्दगी है पास सबके, क्यों जीने का रवैया नहीं ?

धुंध छाए आकाश में, बरसता बादल है धुआं नहीं
विकल्प सबके पास है, चुनने का हक़ या हुनर नहीं
जय होती दूसरों की, क्यों पहले खुद की नहीं ?
सवाल करे जहां से, क्यों पहले खुद से नहीं ?

सच्चाई की राह इंसान भटकता है, राह खुद नहीं
समझ छोटी-छोटी बातें, कर बड़ी-बड़ी बातें नहीं
धुंधला हो रहा जहां, कहीं धूल तेरे ऐनक में तो नहीं ?
ढूंढ़ता जीवन ग्रहों पर, क्यों शुरुआत अपने घर से नहीं ?

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अपने सपने हो गए

The Horizon

एक-एक कर सब अपने
अब सपने हो गए
कुछ सपने हैं
उसमें से कुछ ही अपने हैं
जाने पहचाने रिश्ते
अनजाने हो गए
देखते-देखते
क्या से क्या हो गए
कुछ पल में बदल गए
कुछ तो बस
यूं ही बदल गए
हम देखते रह गए कि
कब हम पराए हो गए
कोई पूछे नहीं हाल-चाल
रिश्तों में खटास
ऐसे ही गुज़रे
जाने कितने साल-दर-साल
सोचता हूं रूठ जाऊं
बस बहुत हो गया
ऐसे जीते-जीते, पर
मनाने वाला कौन है
जाने को चला जाऊं
सब छोड़ कर, पर
जाने के बाद
रोने वाला कौन है
चार दिन में भूल जाते हैं लोग
मतलब निकल जाने पर पूछते
भाईसाहब आप कौन हैं ?
जी रहा हूँ मैं, पर
किसलिए ?
किसके लिए ?

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बचपन

Great post with great message.
It’s a social need to protect the childhood and every child deserves that.
It’s the foundation of a value driven society where children learn and prosper.

THE HIDDEN SOUL

कहीं गुम हो गई वो मासुमियत
खो गई कहीं वो प्यारी मुसकान
इस असंतोषी भागमभाग भारी ज़िन्दगी में
यादें उन बीते दिनों की
यादें उन गुजरे पलों की
याद आती है फिर
बचपन की वो हँसी फुलवारी
थोड़ा कच्चापन, थोड़ी नादानी
वो हर समय की खेल-कूद
वो हर पल शैतानी
नहीं जानते क्या सही या गलत
नहीं जानते छल-कपट
वो तोतली आवाज़ में बातें
वो हर पल दिमाग में चलती नई खुराफाती
वो हर दिन की नई जिज्ञासा
नए नए प्रश्नों के साथ हाजिर
वो छोटी छोटी लड़ाई दो पल की
फिर मनाना दो पल का
पर ये विडंबना आज की
कि छिन गया है बचपन बच्चो का
अब हाथ में खिलौने या किताबें नहीं
औजार है
नन्हे नन्हें बच्चें पालक है परिवार के
बच्चे काम पर जा रहे है
खो रहा है बचपन
खो रहा है बचपन ।
© ईरा सिंह

ये कविता मैंने कॉलेज में कविता लेखन प्रतियोगिता…

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