THE RIGHT WAY OF CHARITY

GITA WISDOM # 48 दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्‌॥ दान देना ही कर्तव्य है- ऐसे भाव से जो दान देश तथा काल (जिस देश-काल में जिस वस्तु का अभाव हो, वही देश-काल, उस वस्तु द्वारा प्राणियों की सेवा करने के लिए योग्य समझा जाता है।) और पात्र के (भूखे, अनाथ,Continue reading “THE RIGHT WAY OF CHARITY”

NEGATIVE SPIRITUALITY

GITA WISDOM # 47 मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः।परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्‌॥ जो तप मूढ़तापूर्वक हठ से, मन, वाणी और शरीर की पीड़ा के सहित अथवा दूसरे का अनिष्ट करने के लिए किया जाता है- वह तप तामस कहा गया है ॥19॥ Obstinate spirituality that hurts body and mind as well as causes harm to others isContinue reading “NEGATIVE SPIRITUALITY”

RITUALS OF THE LAZY FOLKS

GITA WISDOM # 45 विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्‌।श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते॥ शास्त्रविधि से हीन, अन्नदान से रहित, बिना मन्त्रों के, बिना दक्षिणा के और बिना श्रद्धा के किए जाने वाले यज्ञ को तामस यज्ञ कहते हैं ॥13॥ Men possessed of lazy approaches to life carry out religious practices not sanctified by the scriptures with indifference and bereftContinue reading “RITUALS OF THE LAZY FOLKS”

RITUALS OF THE ARROGANT FOLKS

GITA WISDOM # 44 अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्‌।इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्‌॥ परन्तु हे अर्जुन! केवल दम्भाचरण के लिए अथवा फल को भी दृष्टि में रखकर जो यज्ञ किया जाता है, उस यज्ञ को तू राजस जान ॥12॥ The arrogant and greedy folks perform rituals to impress others and to get earthlyContinue reading “RITUALS OF THE ARROGANT FOLKS”

KNOWING LAUGHTER

Originally posted on Pointless Overthinking:
Provided by Billy Osogo Dr Brené Brown, in her insightful book, I Thought It Was Just Me, writes about “knowing laughter.” She defines it as “laughter that results from recognizing the universality of our shared experiences, both positive and negative.” It is this knowing laughter that I so viscerally experienced…

RITUALS OF THE PIOUS SOULS

GITA WISDOM # 43 अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते।यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः॥ जो शास्त्र विधि से नियत, यज्ञ करना ही कर्तव्य है- इस प्रकार मन को समाधान करके, फल न चाहने वाले पुरुषों द्वारा किया जाता है, वह सात्त्विक है ॥11॥ The pious mortals follow rituals which are prescribed in the scriptures. They perform themContinue reading “RITUALS OF THE PIOUS SOULS”

THE FOOD OF THE LAZY SOULS

GITA WISDOM # 42 यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्‌।उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्‌॥ जो भोजन अधपका, रसरहित, दुर्गन्धयुक्त, बासी और उच्छिष्ट है तथा जो अपवित्र भी है, वह भोजन तामस पुरुष को प्रिय होता है ॥10॥ The lethargic folks go for half-cooked, tasteless and smelly leftovers which is unclean and dirty. (17.10) Have a niceContinue reading “THE FOOD OF THE LAZY SOULS”

THE FOOD OF THE GREEDY SOULS

GITA WISDOM # 41 कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः।आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः॥ कड़वे, खट्टे, लवणयुक्त, बहुत गरम, तीखे, रूखे, दाहकारक और दुःख, चिन्ता तथा रोगों को उत्पन्न करने वाले आहार अर्थात्‌ भोजन करने के पदार्थ राजस पुरुष को प्रिय होते हैं॥9॥ Dry and irritable food which is sour, spicy and extremely hot is the preferred menu of the avaricious people.Continue reading “THE FOOD OF THE GREEDY SOULS”

THE FOOD OF THE NOBLE SOULS

GITA WISDOM # 40 आयुः सत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः।रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः॥ आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को बढ़ाने वाले, रसयुक्त, चिकने और स्थिर रहने वाले (जिस भोजन का सार शरीर में बहुत काल तक रहता है, उसको स्थिर रहने वाला कहते हैं।) तथा स्वभाव से ही मन को प्रिय- ऐसे आहार अर्थात्‌ भोजनContinue reading “THE FOOD OF THE NOBLE SOULS”

LIFE STYLES

GITA WISDOM # 39 (आहार, यज्ञ, तप और दान के पृथक-पृथक भेद) आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः।यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं श्रृणु॥ भोजन भी सबको अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार तीन प्रकार का प्रिय होता है। और वैसे ही यज्ञ, तप और दान भी तीन-तीन प्रकार के होते हैं। उनके इस पृथक्‌-पृथक्‌ भेद को तू मुझ सेContinue reading “LIFE STYLES”

YOU ARE THAT

GITA WISDOM # 38 सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥ हे भारत! सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके अन्तःकरण के अनुरूप होती है। यह पुरुष श्रद्धामय है, इसलिए जो पुरुष जैसी श्रद्धावाला है, वह स्वयं भी वही है॥3॥ Every human being is possessed of a pattern of behavior (shradha) as perContinue reading “YOU ARE THAT”

VIEWING COMPETITIVE STRENGTH

GITA WISDOM # 37 योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः।धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः॥ दुर्बुद्धि दुर्योधन का युद्ध में हित चाहने वाले जो-जो ये राजा लोग इस सेना में आए हैं, इन युद्ध करने वालों को मैं देखूँगा॥23॥ An executive has to conduct a field study of the market, before making decisions. That is exemplified by Arjuna’s action, whenContinue reading “VIEWING COMPETITIVE STRENGTH”

🙏 GURU TEGH BAHADUR 🙏

Martyrdom Day: 24 November Guru Tegh Bahadur (1 April 1621 – 24 November 1675) was the ninth of ten Gurus of the Sikh religion. He was born at Amritsar in 1621 and was the youngest son of Guru Hargobind. His term as Guru ran from 1665 to 1675. One hundred and fifteen of his hymnsContinue reading “🙏 GURU TEGH BAHADUR 🙏”