GITA WISDOM # 55 Chapter 3 Verse 26 न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङि्गनाम्।जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन्॥ परमात्मा के स्वरूप में अटल स्थित हुए ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि वह शास्त्रविहित कर्मों में आसक्ति वाले अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम अर्थात कर्मों में अश्रद्धा उत्पन्न न करे, किन्तु स्वयं शास्त्रविहित समस्त कर्म भलीभाँति करता हुआ उनसे भी वैसेContinue reading “LEADING FROM THE FRONT”
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FOLLOWERSHIP
GITA WISDOM # 54 Chapter 3 Verse 23 यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः।मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥ क्योंकि हे पार्थ! यदि कदाचित् मैं सावधान होकर कर्मों में न बरतूँ तो बड़ी हानि हो जाए क्योंकि मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं ॥23॥ Men tend to follow the path ofContinue reading “FOLLOWERSHIP”
LEADERSHIP
GITA WISDOM # 53 Bhagavad Gita: Chapter 3 Verse 21 यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य पुरुष भी वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, समस्त मनुष्य-समुदाय उसी के अनुसार बरतने लग जाता है (यहाँ क्रिया में एकवचन है, परन्तु ‘लोक’ शब्द समुदायवाचकContinue reading “LEADERSHIP”
A THOUGHT ON LIFE
Have a nice day!
HOW WILL YOU KNOW I LOVE YOU?
Unique Times Photo by Jonny Lew on Pexels.com If I buy you a diamond ring, silks and gold so you drip in jewels does that mean I love you more than if I give you an orange from my garden or write a poem from my soul and trace hearts on your body? If IContinue reading “HOW WILL YOU KNOW I LOVE YOU?”
A THOUGHT ON RELATIONSHIPS & MATURITY
Have great time with family and friends…
LIFE IS LIKE A CAMERA
Have a nice day!
NOBLE THOUGHTS # 44
Have great time…
STAGES OF FORGIVENESS
Originally posted on Be Inspired..!!:
Though forgiveness can help repair a damaged relationship, it doesn’t obligate you to reconcile with the person who harmed you, or release them from legal accountability. Instead, forgiveness brings the forgiver peace of mind and frees him or her from corrosive anger. Here are the four stages of forgiveness : Uncovering – Gaining insight…
BENCHMARKING LEADERSHIP
GITA WISDOM #52 Bhagavad Gita: Chapter 3 Verse 20 कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः।लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि॥ जनकादि ज्ञानीजन भी आसक्ति रहित कर्मद्वारा ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए थे, इसलिए तथा लोकसंग्रह को देखते हुए भी तू कर्म करने के ही योग्य है अर्थात तुझे कर्म करना ही उचित है॥20॥ It is essential for a chief executiveContinue reading “BENCHMARKING LEADERSHIP”
FALSE PRETENCES OF SPIRITUALITY
GITA WISDOM # 51 दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्।स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्॥ जो कुछ कर्म है वह सब दुःखरूप ही है- ऐसा समझकर यदि कोई शारीरिक क्लेश के भय से कर्तव्य-कर्मों का त्याग कर दे, तो वह ऐसा राजस त्याग करके त्याग के फल को किसी प्रकार भी नहीं पाता॥8॥ Actions involve efforts. IfContinue reading “FALSE PRETENCES OF SPIRITUALITY”
NEGATIVE CHARITY
GITA WISDOM # 50 अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते।असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्॥ जो दान बिना सत्कार के अथवा तिरस्कारपूर्वक अयोग्य देश-काल में और कुपात्र के प्रति दिया जाता है, वह दान तामस कहा गया है॥22॥ The foolish mortals resort to methods of charity which are directed to the wrong recipients at the wrong time and place and are givenContinue reading “NEGATIVE CHARITY”
AGGRESSIVE CHARITY
GITA WISDOM #49 यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः।दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्॥ किन्तु जो दान क्लेशपूर्वक (जैसे प्रायः वर्तमान समय के चन्दे-चिट्ठे आदि में धन दिया जाता है।) तथा प्रत्युपकार के प्रयोजन से अथवा फल को दृष्टि में (अर्थात् मान बड़ाई, प्रतिष्ठा और स्वर्गादि की प्राप्ति के लिए अथवा रोगादि की निवृत्ति के लिए।)Continue reading “AGGRESSIVE CHARITY”
TRUE LOVE
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A THOUGHT ON RELATIONSHIPS
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